एक बार फिर से जेल जाने के बावजूद ‘राइट -ऑफ ‘ होते नहीं दिखते लालू

आलोक कुमार , वरिष्ठ पत्रकार व् विश्लेषक 

              मेरी स्पष्ट राय है कि पिछड़ों और दलितों को मंडल के बाद से मिली ताकत का राजनीतिक इजहार ही है लालू की राजनीति । समाज में उपेक्षित बहुसंख्य समुदाय उत्पादन के संसाधनों से लेकर सांस्कृतिक उत्पादों तक से वंचित था। उसने स्पेस पर दावेदारी की, जिसके कारण सामंती सुकून में जी रहे समाज में हलचल पैदा हुई, जिसे कालांतर में गुंडाराज, जंगलराज और जातिवाद की संज्ञा दी गई और ऐसा क्यूँ किया गया इसे सीधे शब्दों में समझिए “कोई भी किसी जमीन को जब अपनी मल्कियत समझने की भूल करने लगता है तो वहाँ उसे किसी और की दावेदारी नागवार ही गुजरती है l ”    बिहार में रह कर मैंने पाया कि बिहार में लोकतंत्र से पिछड़ों का, वंचितों का, दलितों का गहरा जुड़ाव है , और ऐसे ही जुड़ाव के कारण हमारे देश में लोकतंत्र चल भी रहा है l ये समूह बखूबी जानता है कि संभावनाएं इसी प्रणाली में बची हुई हैं. उसके लिए स्पेस इसी प्रणाली में है, वरना जो संकुचित सोच वाला वर्ग है , जो उपरनिष्ट बातें तो करता है लेकिन यथार्थ से भागता है , उसे ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि भैंस चरानेवाला बड़ा नेता बन जाए , सूबे की कमान संभाले …. लेकिन ये सच्चाई है कि ऐसे लोगों की संख्या काफी कम है और वोट की राजनीति में ये कोई बहुत बड़ी निर्णायक भूमिका भी नहीं निभाते l
यह भी एक राजनीतिक यथार्थ है कि पिछड़ों – दलित- गरीब वर्ग की सबसे बड़ी राजनैतिक जीत मुख्यमंत्री के रूप में लालू यादव ही थे और लालू का पदच्युत होना उसकी सबसे बड़ी हार भी। लालू यादव ने ही इस पिछड़े-गरीब-दलित वर्ग को पहली बार सत्ता का वह चेहरा दिया जो एक गरीब और पिछड़े का बेटा था। जो उसकी ही तरह जीता था, उसकी भाषा में बातें करता था और उसके बाजू में बैठ उसकी समस्याओं को सुनता था।
      जिस किसी ने भी नब्बे के पूर्व के बिहार को प्रगतिशील चेतना की आंखों से देखा होगा, उन्हें याद होगा कि रहने मात्र के लिए छोटे जमीन के टुकड़ों से भी पिछड़ा और दलित समुदायों को बेदखल किया जाता था। थानों, कचहरियों में उनके साथ कैसा अन्यायपूर्ण व्यवहार होता था, सामाजिक जीवन के रोज़मर्रा में उनके लिए किस स्तर पर अपमान और प्रताड़ना सहज-बोध का हिस्सा थी l यह जानता तो हर कोई ही है , लेकिन इसकी व्याख्या व्यापक सामाजिक – राजनीतिक सन्दर्भ में करने की बजाए अपनी सहूलियत के मुताबिक ही करता है । स्कूलों-कॉलेजों के दरवाजे या तो बंद थे या शिक्षा उनके लिए अपमान और जहालत से गुजर कर प्राप्त होने वाली दुर्लभ व्यवस्था थी। 1990 के बाद लालू यादव के नेतृत्व में इन्हीं वंचित समुदायों, खासकर पिछड़ों ने अपना दावा ठोंका। थानों, कचहरियों से लेकर स्कूलों-कॉलेजों तक वंचित समुदाय ने अपनी सशक्त उपस्थिति उन्होंने दर्ज कराई।
   बिहार के पिछड़े तबके के अधिसंख्य लोगों में आज भी ये गौरव बोध है कि “लालू के बगैर राजनीति में उनकी भागीदारी अधूरी है l” इस तबके के बड़े हिस्से का स्पष्ट तौर पर ये मानना है कि “लालू यादव ने ये साबित तो जरूर किया कि “राजनीति महज सत्ता तक ही सीमित नहीं है बल्कि समाज को समझने और उसे बदलने का भी उपकरण है l”
   आज के दौर की राजनीति का सबसे प्रचलित व् बिकाऊ शब्द है ‘विकास’ लेकिन सतही विकास और यथार्थवादी विकास में बड़ा भेद है l व्यापक सन्दर्भ में विकास की परिभाषा पिछले चार दशकों के दौरान काफी बदल गई है। अब विकास को समाज में स्वतंत्रता के विस्तार के संदर्भ में ज्यादा समझने और देखने की जरूरत है । ऐसे में सड़क का निर्माण अगर विकास है, तो दबे और बुनियादी अधिकारों से वंचित समूहों की स्वतंत्रता में विस्तार उससे कहीं बड़ा विकास है। आर्थिक विकास दर विकास का महज एक पैमाना है, लोगों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों – वैचारिक स्वतंत्रता का विस्तार उससे कहीं बड़ा पैमाना है और यहीं लालू की प्रासंगिकता औरों से ज्यादा है और यहीं एक बार फिर से जेल जाने के बावजूद मुझे ‘राइट -ऑफ ‘ होते नहीं दिखते लालू l

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